अब तो कहिबे की न रही

Chhutak Pada —

Verse 7 of 35

घर घर टहल करत है लक्ष्मी, छिन कतहूं नहिं जाय। व्रज वृन्दावन सुख वैभव लखि, मुक्ति रही सिरनाय॥ - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (133) घर-घर लक्ष्मी फिरती है, जय, मैं कुछ नहीं कहता। व्रज वृन्दावन में सुख वैभव है, मोक्ष उसके मस्तक में है... - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी के वचन, चुटक पद (133)
अब तो कहिबे की न रहीअब तो कहिबे की न रही