अब तो कहिबे की न रही

Chhutak Pada —

Verse 8 of 35

हम तो वृन्दावन रस अटके। [1] जब लगि इहिं रस अटके नाहीं तब लगि बहुबिधि भटके॥ [2] भये मगन सुखसिन्धु माँझ ह्याँ सब तजिकै जग खटके। [3] अब विलास रस रासहि निरखत नागरि - नागर नटके॥ [4] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (118) हम वृन्दावन रास आये। [1] जब रस बहने लगा और रुका नहीं, तब बहुविधि भटकने लगी। [2] भये मगन सुखसिंधु मंज ह्यं सब जिकै जग कटके। [3] अब विलास रस रसहि निराखत नागरी - नागर नाटके.. [4] - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छुटक पद (118)
अब तो कहिबे की न रहीअब तो कहिबे की न रही