ब्रज की रज मैं भई क्यों न बीर
Chndrasakhi Padavali — श्री चन्द्रसखी जी
Verse 1 of 3
ब्रज की रज मैं भई क्यों न बीर।
परी रहत गोकुल की डगर में उड़ उड़ लागत स्याम सरीर॥ [1]
सुर नर मुनि ब्रह्मादि दुर्लभ श्रवण सुनत बंसीवट तीर।
चंद्रसखी भज बालकृष्ण छबि मिल गए मोहन मिट गई पीर॥ [2]
- श्री चन्द्रसखी जी, चंद्रसखी पदावाली (7)
ब्रज के राज्य में, क्यों नहीं भाई? शरीर गोकुल पथ में फिरता प्रतीत होता है.. [1] सुर नर मुनि ब्रह्मादि दुर्लभ श्रवण सुनत बंसीवत तीर। चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छवि मोहन मिल गये, दुःख दूर हो गया.. [2] - श्री चन्द्रसखी जी, चन्द्रसखी पदावली (7)