ब्रज की रज मैं भई क्यों न बीर

Chndrasakhi Padavali — श्री चन्द्रसखी जी

Verse 2 of 3

श्री राधेरानी, दे डारो ना वाँसुरी मोरी। जा वंसी में मेरो प्राण वसत है, सो वंसी गयी चोरी॥ [1] सोने की नाँही, कान्हा, रूपे की नाँही हरे बाँस की पोरी। काहे से गाऊँ, राधे, काहे से बजाऊँ, काहे से लाऊँ गैयाँ घेरी॥ [2] मुख से गावो, प्यारे ताल से बजावो लकुटिया में लावो गैयाँ घेरी। चंद्रसखी भज बालकृष्ण छवि, हरि चरणन की चेरी॥ [3] - श्री चन्द्रसखी जी, चंद्रसखी पदावाली (33) श्रीराधेरानी, ​​वाणासुरी मोरी से मत डरो। जा, मेरी आत्मा वानसी में है, इसलिए वानसी लड़की के पास जा.. [1] छोटे सोने के कान्हा, छोटे हरे बांस और चांदी के बर्तन। मैं क्यों गाऊं, राधे, मैं क्यों गाऊं, मैं क्यों गाऊं, मुख से गाऊं, मधुर लय से गाऊं, गायों को गोद में ले आऊं। चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छवि, हरि चरणन की चेरी.. [3] - श्री चन्द्रसखी जी, चन्द्रसखी पदावली (33)
ब्रज की रज मैं भई क्यों न बीरतेरो मुख नीको कि मेरो स्यामा प्यारी