देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी

Gadadhar Bhatt Vani — श्री गदाधर भट्ट

Verse 3 of 10

(राग पंचम एवं राग मालकोस) देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी। गीत विचित्र कोलाहल कौतुक संग सखा लख कोरी॥ [1] आई झूमि झूमि झुंडन जुरि अगनित गोकुल गोरी। तिनमें जुवती कदम्ब शिरोमणि राधा नवल किसोरी॥ [2] छिरकत ग्वालबाल अबलन पर बूका वदन रोरी। अरुन अकास देखि संध्या भ्रम पुनि मनसा भई बौरी॥ [3] रपटत चरन कीच अरगजा की केसरी कुंकुम घोरी। कही न जाय ‘गदाधर’ पै कछु बुधिबल मति भई थोरी॥ [4] - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (68) (राग पंचम एवन राग मालाकोसा) देखो देखो ब्रजकी बिथिनी बिथिनी बजाती है हरि होरी। गीत विचित्र शोर कौतुक संग सखी लाख कोरी.. [1] ऐ झुम्मी झुम्मी झुंदन जुरि अग्नित गोकुल गोरी। इनमें जुवती कदंब शिरोमणि राधा नवल किसोरी भी शामिल हैं। [2] चिरकत ग्वालबल अबलान पर बुका वदन रोरी। अरुण एकस देखि संध्या भ्रम पुनि मनसा भई बौरि।।[3] अरगजा के फिसलते चरण के श्वेत रंग केसरिया कुमकुम। कहिन जय 'गदाधर' पै कछु बुधिबल मति भाई थोरी.. [4] - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी का भाषण (68)
देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरीदेखोऊ प्यारी कुंजबिहारी मूरति