देखोऊ प्यारी कुंजबिहारी मूरति
Gadadhar Bhatt Vani — श्री गदाधर भट्ट
Verse 4 of 10
(राग बसंत)
देखोऊ प्यारी कुंजबिहारी मूरति बंत बसंत।
मोरी तरुण तरुलता तनमै मनसिज रस वरसंत॥ [1]
अरुण अधर नव पल्लव शोभा विहसनि कुसुम विकाश।
फूले बिमल कमल से लोचन सूचित मनको हुलास॥ [2]
चल चूर्ण कुन्तल अलिभाला मुरली कोकिल नाद।
देखीयति गोपीजन बनराई मुदित मदन उनमाद॥ [3]
सहज सुवास स्वास मलयानिल लागत सदानि सुहायौ।
श्री राधामाधवी गदाधर प्रभु परसत सुखपायौ॥ [4]
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (57)
(राग बसंता) देखो प्रिय कुंजबिहारी मुराती बंट बसंत। मोरी तरूण तरुलता तन्मई मनसिज रस वसंत..[1] अरुण अधर नव पल्लव शोभा विहासनि कुसुम विकास। फुले बिमल कमल से लोचन सुचित मानको हुलास.. [2] चल मंथन कुंतल अलिभला मुरली कोकिल नाद। देखियति गोपीजं बनराय मुदित मदन उन्माद।।[3] सहज सुवस स्वस मलयानिल लगत सदानि सुहायौ। श्री राधामाधवी गदाधर प्रभु परसत् सुखापायौ.. [4] - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (57)