देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी
Gadadhar Bhatt Vani — श्री गदाधर भट्ट
Verse 5 of 10
है हरि तें हरिनाम बड़ेरो, ताकों मूढ़ करत कत झेरो॥
प्रगट दरस मुचकुंदहि दीन्हों, ताहू आयुसु भो तप केरो।
सुत-हित नाम अजामिल लीनों, या भव में न कियो फिरि फेरो॥ [1]
पर-अपवाद स्वाद जियो राच्यौ, वृथा करत बकवाद घनेरो।
ताको दसयों अंस ‘गदाधर’, हरि हरि कहत जात कहा तेरो॥ [2]
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (15)
है हरि तेन हरि नाम बदिरो, ताकोण मूढ़ करत कट जीरो.. प्रगट दरस मुचकुंदहि दिन्हो, ताहु आयुसु भो तप केरो। सुता-हित नाम अजामिल लेनो, या भव पुरुष, ऐसा दोबारा मत करो.. [1] परा-असाधारण स्वाद, अपनी रचना को जियो, अपने शब्दों को व्यर्थ में बर्बाद करो। ताको दास्यो उत्तर 'गदाधर', हरि हरि कहत जात कहा तेरो.. [2] - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (15)