नंद-कुल-चंद, वृषभानु-कुल कौमुदी

Gadadhar Bhatt Vani — श्री गदाधर भट्ट

Verse 7 of 10

(राग गौरी) नंद-कुल-चंद, वृषभानु-कुल कौमुदी उदित वृन्दा-विपिन बिमल आकासे। [1] निकट वेष्टित सखीवृन्द, बरतारिका, लोचन-चकोर तिन रूप-रस-प्यासे॥ [2] रसिकजन अनुराग-उदधि तजी मरजाद, भाव अगनित कुमुदिनी-गन विकासे। [3] कहि 'गदाधर' सकल विस्व तमघन, बिना भानु, भव-ताप-अग्यान न बिनासे॥ [4] - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (30) (राग गौरी) नंद-कुल-छंद, वृषभानु-कुल कौमुदी उदित वृंदा-विपिन बिमल आकाशे। [1] निकटवर्ती वेष्टित सखी वृंद, बरतारिका, लोचन-चकोर, तीन रूप रस-प्यास.. [2] रसिकजन अनुराग-उदधि तजि मरजद, भव अग्नित कुमुदिनी-गण विकाससे। [3] जहां 'गदाधर' सब जग तमाघन, बिन भानु, बिन भव-तप-अज्ञान न बिनासे.. [4] - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी के शब्द (30)
मेरे कलिकल्मष कुल नासेदेखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी