देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी
Gadadhar Bhatt Vani — श्री गदाधर भट्ट
Verse 8 of 10
सखी, हौं स्याम रंग रँगी।
देखि बिकाइ गई वह मूरति सूरति माहिं पगी॥ [1]
संग हुतौ अपनौ सपनौ-सौ सोइ रही रस खोइ।
जागेहुं आगें दृष्टि परै सखि नेकु न न्यारौ होइ॥ [2]
एक जु मेरी अंखियन में निसिद्योस रह्यौ कर भौन।
गाय चरावन जात सुन्यौ सखि! सो धौं कन्हैया कौन॥ [3]
कासौं कहौं कौन पतियाबै, कौन करै बकवाद।
कैसें के कहि जात ‘गदाधर’ गूंगे कौ गुड़ स्वाद॥ [4]
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (34)
मित्र, मैं स्याम देश का निवासी हूँ। देखो, बिकी नहीं है, हुस्न के आलम में है.. [1] तुम्हारे साथ सो रही है, नौ सौ ख्वाब लेकर, वो जज्बात खो रही है। जब मैं दोबारा देखता हूं तो मेरा दूसरा दोस्त अकेला नहीं है.. [2] एक जू मेरी अंखियां में निसिद्यो रहियो कर भौं। गे काउबॉय, सुनो दोस्त! तो फिर कौन है कन्हैया? [3] मैं कौन कह सकती हूं, कौन मेरा पति है, जो बकवास करेगा। 'गदाधर' कहानी में गुड़ का स्वाद कहाँ है.. [4] - श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट के शब्द (34)