रँगीली जोरी की बलि जाँव

Ghanananda Granthavali — श्री घनानंद

Verse 10 of 48

(सवैया) हीन भएँ जल मीन अधीन, कहा कछु मो अकुलानि समानै। [1] नीर सनेही कों लाय कलंक, निरास ह्वै कायर त्यागत प्रानै॥ [2] प्रीति की रीति सु क्यौं समझै जड़, मीत के पानि परे कों प्रमानै। [3] वा मन की जु दसा घनआनँद, जीव की जीवनि जान ही जानै॥ [4] - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (100) (सवैया) यदि मैं जल के प्रभाव में भी रहूं तो भी मैं तुमसे कुछ नहीं कहूंगा। [1] वह कौन है जो इतना प्यारा है, वह कौन है जिसमें दाग है, वह प्यार कितना पीला है जो त्याग दिया गया है.. [2] मैं प्रेम की विधि क्यों समझूं, जो कीचड़ के पानी से परे प्रमाण है। [3] वा मन की जू दसा घनानंद की जीवनी, जानत ही जीवन की.. [4] - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजन हित (100)
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