रँगीली जोरी की बलि जाँव

Ghanananda Granthavali — श्री घनानंद

Verse 15 of 48

(सवैया) कमला तप साधि अराधति है, अभिलाष-महोदधि-मंजन कै। [1] हित संपति हेरि हिराय रही, नित रीझ बसी मन-रंजन कै॥ [2] तिहि भूमि की ऊरध भाग दसा, जसुदा-सुत के पद-कंजन कै। [3] घनआनंद-रूप निहारन कौं, ब्रज की रज आखिन अंजन कै॥ [4] - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (467) (सवैया) कमल तप से पूजित, कामना-महोदधि-मंजन की। [1]. [3] ब्रज के राजा घनानंद का रूप कौन देख सकता है.. [4] - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (467)
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