रँगीली जोरी की बलि जाँव

Ghanananda Granthavali — श्री घनानंद

Verse 20 of 48

मेरे मन दृग रीझि की, राधा ही कों बूझि। राधा के मन रीझि की, मोहि बूझि अरु सूझि॥ - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (70) मेरे मन में एक लालसा थी, केवल राधा ही उसे बुझा नहीं सकती थी। राधा का हृदय प्रेम से भर गया, मेरा प्रेम बुझकर जाग उठा.. - श्री आनंदघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (70)
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