राधा माधौ बिहरै बन मैं

Ghanananda Granthavali — श्री घनानंद

Verse 26 of 48

(राग विहाग) राधा माधौ बिहरै बन मैं। हरी भरी कुंजनि जमुनातट फूले फूले मन मैं॥ [1] मदन-केलि-सुख-पगे जगमगे जगी तरुनई तन मैं। अरस-परस तन बन परसत आनँदघन भीजे पन मैं॥ [2] - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (188) (राग विहागा) राधा माधौ बिहारै बन मैं। हरि भरी कुंजनि जमुनातत फुले फुले मन मैं..[1] मदन-केलि-सुखा-पगे जगमगे जग तरुनै तन मैं मैं। अरसा-पारस तन बन परसत अन्नघन भीजे पैन मैं.. [2] - श्री आनंदघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (188)
रँगीली जोरी की बलि जाँवरँगीली जोरी की बलि जाँव