रँगीली जोरी की बलि जाँव

Ghanananda Granthavali — श्री घनानंद

Verse 3 of 48

ब्रजबन-लीला-माधुरी, निरविधि रस कौ सार। रसिक-मुकुटमणि कृपा तें, पायौ प्रेम-आधार॥ - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, अनुभव चंद्रिका (54) ब्रजबन-लीला-माधुरी का सार, नीरविधि रस। रसिक-मुकुटमणि कृपा तेन, प्यु प्रेम-अधार.. - श्री आनंदघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, अनुभव चंद्रिका (54)
रँगीली जोरी की बलि जाँवरँगीली जोरी की बलि जाँव