राधा राधा रटि राधा राधा रटि मेरी

Ghanananda Granthavali — श्री घनानंद

Verse 30 of 48

(राग पूर्वी चौताला) राधा राधा रटि राधा राधा रटि मेरी रसना रसीली भई। ज्यौं हीं ज्यौं पीवति या रस कों त्यौं त्यौं प्यास नई॥ [1] ब्रजजीवन की परम सजीवन सो निज जीवनि जानि लई। आनंदघन उमंग-झर लाग्यौ ह्वै रही नाममई॥ [2] - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (500) (राग पूर्वी चौटाला) राधा राधा रति राधा राधा रति मेरी रसना रसीली भाई। जब तक मैं जीवित हूं, मुझे प्रेम की कोई प्यास नहीं है.. [1] मैं अपने जीवन को ब्रजजीवन का चरम रूप जानता हूं। आनंदघन उमंग-झर लगायौ वै रहि नामामाई.. [2] - श्री आनंदघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (500)
रँगीली जोरी की बलि जाँवरँगीली जोरी की बलि जाँव