रँगीली जोरी की बलि जाँव
Ghanananda Granthavali — श्री घनानंद
Verse 34 of 48
रसिकनी राधा राधा है।
जाके मिलिबे की मोहन के नित ही साधा है॥ [1]
ब्रजमोहन मोह्वौ इन आछै रही न बाधा है।
परम प्रेम रस-निधि आनँदघन प्रेम-समाधा है॥ [2]
- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (792)
रसिकनि राधा ही राधा हैं। जेक मिलिबे मोहन की दिनचर्या के अनुयायी हैं.. [1] अचै रहे न बधाई में ब्रज मोहन मोहावौ। परम प्रेम रस-निधि आनंदघन प्रेम-समाध है.. [2] - श्री आनंदघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (792)