ऐसें आरती करौ
Ghanananda Granthavali — श्री घनानंद
Verse 38 of 48
(राग गंधार)
ऐसें आरती करौ।
सुथिर थार हिय बिसद बीच लै प्रेम-प्रदीप धरौ॥ [1]
उज्जल दसा सनेह-सँजोई जोति जगाइ ढरौ।
भाव-पुहुप प्रतीति सों संजुत बारनि ओर अरौ॥ [2]
मोहन-मुख जगमगनि पानि पै निरखत हरष भरौ।
आनँदघन उमाह आरति कौं हरिहि बढ़ाइ हरौ॥ [3]
- श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (240)
(राग गंधार) अइसन आरती करें. सुथिर थार ही बिसाद बिच लै प्रेमा-प्रदीप धरौ.. [1] उज्वल दास सनेहा-संजोई जोति जगाई धरौ। भव-पुहुप प्रतीति पुत्र स्नजुत बरनि य अरौ..[2] मोहना-मुख जगमगानि पै पै निरखत कठिन भरु। आनंदघन उमाह आरती कौन हरिहि बधाई हरौ.. [3] - श्री आनंदघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (240)