कबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोर
Gitamrit Gnga — श्री वृंदावन देवाचार्य
Verse 1 of 4
बक विषयीजन परस इहि, वेऊ विमल ह्वै जाउ।
जानी अजानि लगै जु, अय पारस करै प्रभाउ॥
- श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा
विषय वस्तु पारस है, दृष्टि विमल है। जानि अंजनि लागै जू, मैं पारस करि प्रभु.. - श्री वृन्दावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा