कबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोर

Gitamrit Gnga — श्री वृंदावन देवाचार्य

Verse 2 of 4

कबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोर। सदा एकरस नेहमय, विहरत युगल किशोर॥ - श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (8.2) तुम कब भूले, ये जोड़ी दिल चोर है। सर्वदा नीरस नेहामाया, विहारत युगल किशोर.. - श्री वृन्दावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (8.2)
कबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोरनेह निगौड़े को पैडौ ही न्यारौ