कबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोर

Gitamrit Gnga — श्री वृंदावन देवाचार्य

Verse 4 of 4

वृंदावन गिरी तैं चली, रस की उठत तरंग। करहु स्नान नित भक्त मन इहिं गीतामृत गंग॥ - श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा वृन्दावन झरने, उठती रस की लहर। मुझे अपने भक्त के मन को प्रतिदिन गीतामृत गंगा से स्नान कराना है.. - श्री वृन्दावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा
नेह निगौड़े को पैडौ ही न्यारौ