नेह निगौड़े को पैडौ ही न्यारौ

Gitamrit Gnga — श्री वृंदावन देवाचार्य

Verse 3 of 4

(राग पूर्वी) नेह निगौड़े को पैडौ ही न्यारौ। जो कोई होय कैं आंधौ चलै, सुलहै प्रिय वस्तु चहूँघा उजारौ॥ [1] सो तो इतै उत भूल्यौ फिरै न, लहै कछु जो कोउ होइ अंख्यारौ। 'वृन्दावन' सोई याको पथिक है, जापै कृपा करै कान्हर कारौ॥ [2] - श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (4.70) (राग पूर्वी) नेह निगोड़े को पढ़ौ ही न्यारौ। कौन है, मैं आँख मूँद कर क्यों चलूँ, मेरा प्रिय वास्तु तो नष्ट हो गया। [1] 'वृन्दावन' यात्री की तरह सोता है, मंगल वचन पढ़ता है, प्रार्थना करता है... [2] - श्री वृन्दावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा (4.70)
कबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोरकबहुँ न विछुरै जोरि यह, दम्पति जनमन चोर