यह जु एक मन बहुत ठौर करि
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 11 of 43
(राग गौरी)
बैंनु माई बाजै बंसीवट।
सदा बसंत रहत वृंदावन पुलिन पवित्र सुभग जमुना तट॥ [1]
जटित क्रीट मकराकृत कुंडल मुखारविंद भँवर मानौं लट।
दसननि कुंद कली छबि लज्जित सज्जित कनक समान पीत पट॥ [2]
मुनि मन ध्यान धरत नहिं पावत करत विनोद संग बालक भट।
दास अनन्य भजन रस कारन हित हरिवंश प्रकट लीला नट॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (64)
(राग गौरी) बैणु माई बैजै बंसीवत। सदा वसन्त ऋतु, वृन्दावन सेतु, पावन सुप्रभात, यमुना तट।।[1] मकारित कुण्डल, मुख, बवंडर, लट जाति। दस्नानि कुण्ड, काली छवि, लज्जा से सुशोभित, कनक समन पट पट.. [2] ऋषि का मन पृथ्वी पर नहीं लगता, बालक हास्य में नहाया हुआ है। दास अन्य भजन रस कारण हित हरिवंश प्रकट लीला नट.. [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (64)