बनी श्रीराधा मोहन की जोरी
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 13 of 43
(राग सारंग)
बैठे लाल निकुंज भवन।
रजनी रुचिर मल्लिका मुकुलित त्रिविध पवन॥ [1]
तूँ सखी काम केलि मन मोहन मदन दवन।
वृथा गहरु कत करति कृसोदरी कारन कवन॥ [2]
चपल चली तन की सुधि बिसरी सुनत श्रवन।
(जै श्री) हित हरिवंश मिले रस लंपट राधिका रवन॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (40)
(राग सारंग) बैठे लाल निकुंज भवन। रजनी रुचिर मल्लिका मुकुलित त्रिविध पावन..[1] काम खातिर तुम मेरे दोस्त मोहन मदन दावान हो. शून्य को सम करने का प्रयोजन क्या है.. [2] शरीर का मन तेजी से चल रहा है, सुन रहा है और सुन रहा है। (जय श्री) हित हरिवंश मील रस लम्पट राधिका रावण.. [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (40)