कुंजबिहारी कौ बसन्त सखि
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 21 of 43
(राग गौड़ व राग मल्हार)
हौं बलि जाँउ नगरी श्याम।
ऐसैं ही रंग करौ निशि-बासर, वृन्दाविपिन कुटी अभिराम॥ [1]
हास-विलास सुरत रस सींचन, पशुपति-दग्ध जिवावत काम।
हित हरिवंश लोल लोचन-अलि, करहु न सफल सकल सुख धाम॥ [2]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (56)
(राग गौड़ वी राग मल्हारा) मैं बलि जानु नागरी श्याम। अइसैन ही रंग निशि-बसर, वृंदाविपिन कुटी अभिराम..[1] पशुपति-दग्धा की एक जीवंत कृति, हँसी और आनंदमय सौंदर्य से भरपूर। हित हरिवंश लोल लोचन-अली, करहु न सफल सकल सुख धाम.. [2] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (56)