राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 20 of 43
नंद के लाल हरयौं मन मोर।
हौं अपने मोतिनु लर पोवति, काँकरी डारि गयो सखि भोर॥ [1]
बंक बिलोकनि चाल छबीली, रसिक सिरोमनि नंद किसोर।
कहि कैसें मन रहत श्रवन सुनि, सरस मधुर मुरली की घोर॥ [2]
इंदु गोबिंद वदन के कारन, चितवन कौं भये नैंन चकोर।
(जै श्री ) हित हरिवंश रसिक रस जुवती तू लै मिलि सखि प्राण अँकोर॥ [3]
- श्री हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (13)
नन्द के लाल हरायूँ मन मोर। मैं अपनी मां की लार हूं, कंकरी डारि गयो सखी भोर.. [1] बीएनके बिलोकनि चल छबीली, रसिक सिरोमनि नंद किसार। सुनते-सुनते कैसे कोई हृदय की बात सुन सकता है, बांसुरी का मधुर गीत.. [2] इंदु गोविंद वदन के कारण, चितवन कौन भये नैनन चकोर। (जय श्री) हित हरिवंश रसिक रस जुवति तू लै मिलि सखी प्राण अंकोर.. [3] - श्री हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (13)