काहे कौं मान बढ़ावतु है
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 24 of 43
(राग कान्हरौ)
काहे कौं मान बढ़ावतु है, बालक मृग - लोचनि।
हौंब डरनि कछु कहि न सकति, इक बात सँकोचनि॥ [1]
मत्त मुरली अन्तर तव गावत, जागृत सैंन तवाकृति सोचनि।
(जैश्री) हित हरिवंश महा मोहन पिय आतुर, विट विरहज दुख मोचनि॥[2]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (74)
(राग कान्हारौ) जिसकी बुद्धि अल्प हो, मृग बालक - लोचनी। इस दौरान मैं कुछ भी नहीं कह पाता, एक बात मन में आती है.. [1] मुरली के मन में मैं गा रहा हूं, मेरा मन जाग रहा है और सोच रहा है। (जयश्री) हित हरिवंश महा मोहन पिया आतुर, वित विरहज दुख मोचनि..[2] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (74)