यह जु एक मन बहुत ठौर करि
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 42 of 43
(राग गौरी)
यह जु एक मन बहुत ठौर करि, कहि कौनें सचु पायौ।
जहँ तहँ विपति जार जुवती लौं, प्रगट पिंगला गायौ॥[1]
द्वै तुरंग पर जोरि चढ़त हठि, परत कौन पै धायौ।
कहिधौं कौन अंक पर राखै, जौ गनिका सुत जायौ॥[2]
(जै श्री) हित हरिवंश प्रपंच बंच सब काल ब्याल कौ खायौ।
यह जिय जानि स्याम-स्यामा पद कमल संगि सिर नायो॥ [3]
- श्री हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (59)
(राग गौरी) यह चिड़ियाघर किसी के दिमाग के लिए एक बेहतरीन जगह है, इसे कहां पाया जा सकता है? जहां भी विपत्ति आती है, पिंगला प्रकट हो जाती है..[1] दो तूफानों पर मजबूती से चढ़ रहा है हाथी, कौन उठाएगा बोझ? कहाँ नम्बर लगाते हो, रंडी कहाँ सोती है..[2] (जय श्री) हित हरिवंश प्रपंच बंच सब खो ब्याल खो खाओ। या जिया जानि श्यामा-श्यामा पद कमल संगी श्री नायो.. [3] - श्री हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (59)