बनी श्रीराधा मोहन की जोरी

Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 41 of 43

(राग सारंग) वन की लीला लालहिं भावै। पत्र प्रसून बीच प्रतिबिंबहिं नख सिख प्रिया जनावै॥ [1] सकुच न सकत प्रकट परिरंभन अलि लंपट दुरि धावै। संभ्रम देति कुलकि कल कामिनि रति रन कलह मचावै॥ [2] उलटी सबै समझि नैंननि में अंजन रेख बनावै। (जै श्री) हित हरिवंश प्रीति रीति बस सजनी स्याम कहावै॥ [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (47) (राग सारंगा) वन लीला ललहिं भवाई। पात्र प्रसून बिच प्रतिबिनबहिं नख सिख प्रिय जनावै।।[1] सिकुड़ नहीं सकते, प्रकट परिभाषा, वासना, दूरी। सम्भ्रं देति कुलकि कामिनी रति रति वर कामचवै।।[2] इसके विपरीत, हर कोई समझता है कि किसी पुरुष या महिला की आंखें किसी अनजान व्यक्ति का निर्माण करेंगी। (जय श्री) हित हरिवंश प्रीति रीति बस सजनि स्याम कहावै.. [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (47)
राधा प्यारी तेरे नैंन सलोलयह जु एक मन बहुत ठौर करि