ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित

Hit Sfut Vani — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 1 of 26

आज तू ग्वाल गोपाल सों खेलि री। [1] छाँड़ि अति मान, बन चपल चलि भामिनी, तरु तमाल सों अरुझि कनक-की-बेलि री॥ [2] सुभट सुंदर ललन, ताप परबल दमन, तू व ललना रसिक काम की केलि री। [3] बेनु कानन कुनित, श्रवन सुंदरी सुनत, मुक्ति सम सकल सुख पाय पग पेलि री॥ [4] विरह-व्याकुल नाथ गान गुन जुवति तव, निरखि मुख, काम कौ कदम अबहेलि री॥ [5] सुनत हरिवंश हित, मिलत राधा-रमन, कंठ भुज मेलि, सुख-सिंधु रस झेलि री॥ [6] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (14) आज आपने ग्वाल गोपाल के साथ खेला। [1]. [3] बेनु कानन कुणित, श्रवण सुंदरी सुनत, मुक्ति सम सकल सुख पाय पग पेली री.. [4] विरह-व्याकुल नाथ गण गुन जुवति तव, निरखि मुख, काम कौ कदम अभेली री.. [5] सुनत हरिवंश हित, मिलत राधा-रमण, कंठ भुज मेलि, सुख-सिंधु रस झेली री.. [6] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्पुत री.. वाणी (14)
ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित