ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित

Hit Sfut Vani — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 11 of 26

निकसि कुंज ठाडे भये, भुजा परस्पर अंस। श्रीराधावल्लभ मुख कमल, निरखि नैन हरिवंश॥ - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (24.3) एक बगीचा ढूँढ़ें, बाहें एक-दूसरे के चारों ओर हों। श्री राधावल्लभ का मुख कमल है, नेत्र निर्मल हैं, हरिवंश... - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्पष्ट वाणी हैं (24.3)
ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासितना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित