ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित

Hit Sfut Vani — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 10 of 26

ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित। [1] छुटि चेतन जु अचेत तेऊ मुनि भये विष वासित॥ [2] पाराशर सुर-इन्द्र कल्प, कामिनी मन फंद्या।[3] परि व देह दुख-द्वन्द्व कौन क्रम-काल निकंद्या॥[4] इहि डरहि डरपि हरिवंश हित जिनहि भ्रमहि गुण-सलिल पर। [5] जिहि नामनि मंगल लोक तिहु सु हरि-पद भज न विलंब कर॥ [6] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (3) कौन जानता है कि कविता का अंत बिना किसी सूचना के कब प्रकाशित हो जाएगा। [1]. यहीं पर हरिवंश की रुचि गुण-माया से पार हो जाती है। [5] जिहि नामनि मंगल लोक तिहु सु हरि-पद भज न विलनब कर.. [6] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (3)
ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासितना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित