ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित
Hit Sfut Vani — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 13 of 26
सारस सर बिछुरंत कौ जो पल सहय सरीर।
अगिनि - अनंग जु तिय भखै तौ जानै पर - पीर॥
तौ जानै पर पीर धीर धरि सकहि बज्र तन।
मरत सारसहिं फूटि पुनि न परचौ जु लहत मन॥
( जै श्री ) हित हरिवंश विचारि प्रेम विरहा बिनु वा रस।
निकट कंत नित रहत मरम कह जानै सारस॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (6)
जिस क्षण आपका सिर बेचैन हो जाता है, आपका शरीर आपका साथ देता है। अगिनी - अंग जू ती भाखै तौ जानै पार - पीर.. तौ जानै पार पीर, अपने शरीर के साथ धैर्य रखें। मरत सरसहिं फूटि पुनि न परचौ जू लहट मन.. (जय श्री) हित हरिवंश विचारी प्रेम विरह बिनु वा रस। नियर कंत नित रहत मरम कह जनाई सरस.. - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (6)