तू रति रंगभरी देखियत है श्री राधे

Hit Sfut Vani — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 14 of 26

(राग बिलावल) तू रति रंगभरी देखियत है श्री राधे, रहसि रमी मोहन सों व रैन। [1] गति अति सिथिल, प्रगट पलटे पट, गौर अंग पर राजत अैन॥ [2] जलज कपोल ललित लटकति लट, भृकुटि कुटिल ज्यौं धनुष धृत मैन। [3] सुंदरी रहिव कहिव कंचुकी कत, कनक-कलश कुच बिच नख दैन। [4] अधर-बिंब दल मलित आलस जुत, अरु आनंद सूचत सखि नैन। [5] (जैश्री) हित हरिवंश दुरत नहिं नागरी, नागर मधुप मथत सुख-सैन॥ [6] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (10) (राग बिलावाला) तू रति रंगभरी देखियात है श्री राधे, रहसी रामी मोहन पुत्र वी रैन। [1] हरकतें बहुत आरामदायक हैं, तालु पट दिखाई दे रहा है, आंखों पर चांदी की आंखें हैं.. [2] पानी की खोपड़ी पर बारीक लटकते बाल हैं, भौंहें घुमावदार हैं जैसे कि मैंने धनुष पकड़ रखा हो। [3] सुन्दरी रहिव कहिव किंचुकी काट, कनक-कलश कुछ बिच नख दैन। [4] अधारा-बिनब दल मालित अलस जुट, अरु आनंद सुचत सखी नैन। [5] (जयश्री) हित हरिवंश दुरत नहिं नागरी, नगर मधुप मथत सुख-सेन.. [6] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (10)
ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासितना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित