ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित
Hit Sfut Vani — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 4 of 26
चकई! प्रान जु घट रहैं, पिय-बिछुरन्त निकज्ज।
सर-अन्तर अरु काल निशि, तरफि तेज घन गज्ज॥
तरिफ तेज घन गज्ज, लज्ज तुहि वदन न आवै।
जल-विहून करि नैंन, भोर किहिं भाय दिखावै॥
(जैश्री) हित हरिवंश विचारि, वाद अस कौंन जु बकई।
सारस यह सन्देह, प्रान घट रहैं जु चकई॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (05)
चकाई! कमज़ोर हो रहा है प्यार मेरा, पिया खामोश और बेबस है। सारा-अन्तर अरु कल निशि, तरफि तेज घन गज्ज.. तरफि तेज घन गज्ज, लज्ज तुहि वदन न आवै। मैं वेब पर नजर रखता हूं, सुबह कहीं डर दिखाता हूं.. (जयश्री) दुनिया में जो बचा है, उस हरिवंश विचारक को मार डालो. यह संशय मधुर है, मेरा जीवन घट रहा है.. - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (05)