ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित
Hit Sfut Vani — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 5 of 26
चलौ वृषभानु गोप के द्वार।
जनम लियौ मोहन हित श्यामा, आनंद-निधि सुकुमार॥ [1]
गावत जुवति मुदित मिलि मंगल, उच्च मधुर धुनि-धार। [2]
बिबिध कुसुम कोमल किसलय दल, सोभित बंदनवार॥ [3]
बिदित वेद-विधि विहित विप्रवर, करि स्वस्तिनु उच्चार। [4]
मृदुल मृदंग, मुरज, भेरी, डफ, दिवि दुंदुभि रवकार॥ [5]
मागध सूत बंदी चारण जस, कहत पुकार-पुकार। [6]
हाटक, हीर, चीर, पाटंबर, देत संभार-संभार॥ [7]
चंदन सकल धेनु-तन मंडित चले जु ग्वाल सिंगार। [8]
(जैश्री) हित हरिवंश दुग्ध-दधि छिरकत, मध्य हरिद्रा गार॥ [9]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (16)
चलो वृषभानु गोप के द्वार। जन्मे लियाउ मोहन हित श्यामा, आनंद-निधि सुकुमार। [1] गावत जुवति मुदित मिलि मंगल उच्च मधुर स्वर। [2] बिबिध कुसुम कोमल किसलय दल, शोभित बंदनवर.. [3] बिबिध वेद-विधि विहित विप्रवर, कारी स्वस्तिनु उच्चर। [4] मृदुल मृदंग, मुरज, भेरी, दफ, दिवि दुंदुभि रावकर.. [5] मगध सुत बंधि चरण जस, कहत पुकार-पुकार। [6]. [8] (जयश्री) हित हरिवंश दुग्ध-दधि चिरकत, मध्य हरिद्रा गर.. [9] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (16)