ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासित

Hit Sfut Vani — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 6 of 26

द्वादश चन्द्र, कृतस्थल मंगल, बुद्ध विरुद्ध, सुरु - गुरु बंक। यद्दि दसम्म भवन्न भृगुसुत, मन्द सुकेतु जनम्म के अंक॥ [1] अष्टम राहु, चतुर्थ दिवामणि, तौ हरिवंश करत्त न संक। जो पै कृष्ण-चरण मन अर्पित, तौ करि हैं कहा नवग्रह रंक॥ [2] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (1) द्वादश चन्द्रमा, कृतस्थल मंगल, बुध विरुद्ध, सुरु-गुरु बीएनके। दशम भाव भृगुसुत हो तो जन्मांक मंद सुकेतु होता है.. [1] आठवां राहु, चौथा दिवामणि, तो हरिवंश को कोई संकोच नहीं। जो अपना मन कृष्ण के चरणों में अर्पित करते हैं, वे नवग्रह रंक कहलाते हैं.. [2] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (1)
ना जानो छिन अंत कवन बुधि घटहि प्रकासितहरि रसना राधा-राधा रट