कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ
Kant Rasik Vani — श्री कान्त किशोर
Verse 3 of 7
न काहू को निन्दनौ, ना काहू की संस।
कान्त रसिक हरिदास जू, मेरे उर अवतंस॥
- श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (20)
न काहू की निंदा करें, न काहू के बेटों की। कांत रसिक हरिदास जू, मेरे उर अवतंस.. - श्री कांत किशोर, कांत रसिक जी की वाणी, दोहा (20)