कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ

Kant Rasik Vani — श्री कान्त किशोर

Verse 4 of 7

रस की नित नव उठत तरंग। हँसत खिलत लतिका-सी झूमत, काम कुसुम भरि अंग॥ [1] तुव तन स्रवत अमित अमृत-रस, पीबत नैन कुरंग। कान्त रसिक के प्राण किसोरी, स्याम किये रति रंग॥ [2] - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, पद (41) रस की नित नवीन उठती लहर। हंसत खलीत लतिका-जैसी झुम्मत, काम कुसुम भारी अंग.. [1] तुव तं स्रवत अमित अमृत-रस, पिबत नैन कुरंग। कांत रसिक का जीवन है किसोरी, स्याम किये रति रंग.. [2] - श्री कांत किशोर, कांत रसिक जी की वाणी, छंद (41)
कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठकान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ