कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ

Kant Rasik Vani — श्री कान्त किशोर

Verse 5 of 7

श्रीहरिदास सरन हौं आयौ। झूठे सब बंधान जगत के छूटे, सुचि सुख पायौ॥ [1] कुंज महल की गौर स्याम छबि, मत्त भयौ उर लायौ। ‘कान्त रसिक’ के स्याम किसोरी, हुलसि हुलसि जस गायौ॥ [2] - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, पद (35) मैं श्री हरिदास की शरण में आया हूँ। संसार के सब झूठे बंधन छोड़ो, ऐसा सुख भोगो.. [1] कुंज महल की सुंदर छवि देखो, भय से मतवाले हो जाओ। 'कांत रसिक' के स्याम किसोरी, हुलसि हुलसि जस गयौ.. [2] - श्री कांत किशोर, कांत रसिक जी की वाणी, छंद (35)
कान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठकान्त द्वैत अद्वैत नहि नहीं अशिष्ट-विशिष्ठ