बिलसत प्यारी-लाल कुंज रजनी

Kelimal — स्वामी श्री हरिदास

Verse 22 of 69

(राग केदारौ) अद्भुत गति उपजति अति नृत्तत दोऊ मंडल कुँवर किसोरी। [1] सकल सुधंग अंग भरि भोरी पिय नृत्तत मुसिकनि मुख मोरी परिरंभन रस रोरी॥ [2] ताल धरैं बनिता मृदंग चंद्रागति घात बजै थोरी थोरी। [3] सप्त भाइ भाषा बिचित्र ललिता गायनि चित चोरी॥ [4] श्रीबृन्दाबन फूलनि फूल्यौ पूरन ससि त्रिबिध पवन बहै थोरी थोरी। [5] गति बिलास रस हास परस्पर भूतल अद्भुत जोरी॥ [6] श्रीजमुना जल बिथकित पुहुपनि बरषा रतिपति डारत त्रिन तोरी। [7] श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी कौ रस रसना कहै को री॥ [8] - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (33) (राग केदारौ) अद्भुत गति उपजति, अति नृत्यमय युगल मंडल कुँवर किसोरी। [1]. [3] सप्त भाई भाषा विचित्र ललिता गायनी चित छोरी.. [4] श्रीबृंदाबन फुलनि फुल्यौ पुरान ससि त्रिबिध पवन भाई थोरी थोरी। [5] गति बिलास रस परस्पर सतह अद्भुत जोरी.. [6] श्री जमुना जल बिठकिट पुहुपानी रैन रतिपति डारत तृण तोरी। [7] श्री हरिदास के स्वामी श्याम कुंजबिहारी रस रसन क्या है? [8] - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमल (33)
देखि देखि फूल भईबिलसत प्यारी-लाल कुंज रजनी