द्वै लर मोतिन की एक पुंजा पोति कौ सादा

Kelimal — स्वामी श्री हरिदास

Verse 3 of 69

(राग कान्हरौ) जोरी विचित्र बनाई री माई काहू मन के हरन कौं। [1] चितवत दृष्टि टरत नहीं इत उत मन वच क्रम याही संग भरन कौं॥ [2] ज्यौं घन दामिनि संग रहत नित बिछुरत नाहींन और वरन कौं। [3] श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुँजबिहारी न टरन कौं॥ [4] - श्री स्वामी हरिदास, केलीमाल (4) (राग कान्हारौ) जोरी विचित्र बनै री माई काहू मन के हरण कौन कौन। [1] मन की दृष्टि नहीं जाती, इतना मन और शब्दों का क्रम, इतने से कौन भर सकता है.. [2] प्रिय पत्नी के साथ रहते हुए और कौन एक दूसरे से अलग नहीं हो पाएगा। [3] श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी कौन हैं? [4] - श्री स्वामी हरिदास, केलीमल (4)
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