झुलत डोल दोऊ जन ठाढ़े

Kelimal — स्वामी श्री हरिदास

Verse 57 of 69

(राग गौरी) नव निकुंज ग्रह नवल आगैं नवल बीना मध्य राग गौरी ठटी। [1] मनौं दस इंदु पीयूज़ बरषत सुखद चपल करजावली दृष्टि पिय की जटी॥ [2] रीझि रीझि पिय देत भूषन बसन दाम उर रसन दसननि धरत निरखि सारंग कटी। [3] रसद श्री हरिदास बिहारी अंग अंग मिलत अतन उदोह करत सुरति आरंभटी॥ [4] - श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (106) (राग गौरी) नव निकुंज गृह नवल फिर नवल बिना मध्य राग गौरी थाती। [1]. [3] रसद श्री हरिदास बिहारी, अतन उदोह करत सुरति अरणाभाति जगत के कण-कण से मिलते हैं। [4] - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमल (106)
वृषभानु कुँवरि खेलति बसंतझुलत डोल दोऊ जन ठाढ़े