मो सम कौन कुटिल अविचारी

Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती

Verse 1 of 37

(राग परज वा खम्माच) अहो विहारिन प्राण जीवनी, मो औगन मन में न विचारो। [1] करुणासिन्धु जान निज दासी, दीन दशा मेरी निरवारो॥ [2] निजपन सुमिरौ स्वामिनी भामिनी, बिगड़ी को अब वेग सम्हारो। [3] ललित लड़ैती घटै न बल कछु, कृपा विलोकनि नैक निहारो॥ [4] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (19) (राग परज वा खम्माचा) हे विहारिन प्राण जीवनि, इस बात को मन में मत सोचो। [1] करुणासिंधु जन तेरी दासी, मेरी दीन दशा.. [2] निजपान सुमिरौ स्वामिनी भामिनी, अब शाकाहारी बनो और गरीबों का ध्यान रखो। [3] ललित लड़ैती घटै न बाल कछु, देखो वीर.. [4] - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा व्यंग्य, विनय (19)
देहु निकुंज निवास स्वामिनी