ललित लड़ैती कुँवरि बिनु और न कछुक सुहाई

Kishori Kripa Kataksha — श्री ललित लड़ैती

Verse 37 of 37

श्रीबन धाम सबन तें नीकौं। जाकी रज दुर्लभ ब्रह्मादिक, सुर नर मुनि आदी कौं॥ [1] केलि विहार परस्पर होवत श्याम-भानुनन्दनी कौं। जो रस निरखि देव वधुगन कौं सुरपुर लागत फीकौं॥ [2] जहा दुख द्वन्द्व रहत नहीं कोऊ सुख उपजत है जीकौं। 'ललितलड़ैती' होय वास किम बिन सेवै प्रिया-पी कौं॥ [3] - श्री ललित लड़ैती श्रीबन धाम सबन तेन निकौन। दुर्लभ ब्रह्मादिक, सुर नर मुनि आदि कौन हैं? [1] केली विहार वार्तालाप में श्यामा-भानुनंदानी कौन हैं? कौन हैं रस निरखि देव दुल्हनें? [2] जहाँ दुःख और कलह न हो वहाँ सुख की उत्पत्ति कौन कर सकता है? 'ललितालदैति' होय वास किम बिन सेवै प्रिया-पि कौन.. [3] - श्री ललित लड़ैती
ललित लड़ैती कुँवरि बिनु और न कछुक सुहाई