ब्रज में रतन राधिका गोरी
Krishnadas Vani — श्री कृष्णदास अधिकारी
Verse 1 of 28
(राग सारंग)
बलिहारी रास विहारिन की।
मरकत मणि कंचन मणि माला ग्रंथित नंद कुमार की॥ [1]
सारंग राग अलापत गावत विच मिलवत गति तालन की।
नाचत गावत बेनु बजावत लेत उदार उगारन की॥ [2]
जमुना पुलिन मल्लिका मुकुलित त्रिविध समीर सुढारन की।
'कृष्णदास' बल गिरधर नवरंग सुरत नाथ सुकुमारन की॥ [3]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (646)
(राग सारंगा) बलिहारी रस विहार का। पन्ना रत्न, कंचन मणि माला, नंदकुमार द्वारा रचित। स्वर्गीय उदार उग्रन के नाचत गावत बेनु बजावत.. [2] जमुना पुलिन मल्लिका मुकुलित त्रिविध समीर सुधारन के। 'कृष्णदास' बाल गिरधर नवरंग सूरत नाथ सुकुमारन की.. [3] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (646)