बाँसुरी बाजत मदन मोहन जू की

Krishnadas Vani — श्री कृष्णदास अधिकारी

Verse 2 of 28

(राग षट) बाँसुरी बाजत मदन मोहन जू की तट यमुना के तीर री। श्रवण सुनत मेरी सुध बुध बिसरी कहा करूँ मेरी बीर री॥ [1] एक डर तौ मोहि सास ननद को दूजी लोकलाज कुल भीर री। 'कृष्णदास' गिरधर नहिं मानत, नहिं जानत मेरी पीर री॥ [2] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (राग शता) बंसी बजावत मदन मोहन जू की, तात यमुना की तीर री। श्रवण मेरे मन की सुनता है और मेरे दुखों को भूल जाता है.. [1] एक समय की बात है, मेरी प्यारी भाभी पर दुनिया के सारे दुखों का बोझ था। 'कृष्णदास' गिरधर नहीं मानते, मेरा दर्द नहीं जानते.. [2] - श्री कृष्णदास की वाणी, श्री कृष्णदास अधिकारी जी
ब्रज में रतन राधिका गोरीब्रज में रतन राधिका गोरी