मन लाग्यो गिरधर गावै

Krishnadas Vani — श्री कृष्णदास अधिकारी

Verse 13 of 28

(राग भैरव) मन लाग्यो गिरधर गावै। ततथेई ततथेई तत तत ताथेई, भैरौं राग मिल मुरली बजावै॥ [1] नाचत नव वृषभानु दुलारी, अवधर गति में गति उपजावै। गिरधर पिय प्यारी की पदरज, कृष्ण दास लै शीश चढ़ावै॥ [2] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (राग भैरव) गिरधर गाने का मन हुआ। ततथि ततथि, भैरौं राग मिल मुरली बजावै..[1] नाचती नाव वृषभानु दुलारी, अवधर गति में गति उपजवै। गिरधर पिया पियारी के पिता कृष्ण दास शीश लेकर चढ़ाते हैं.. [2] - श्री कृष्णदास की वाणी, श्री कृष्णदास अधिकारी जी
लालन तेरे ही आए आजु सुहावनी रातिवृषभानु कुँवरि खेलति बसंत