वृषभानु कुँवरि खेलति बसंत

Krishnadas Vani — श्री कृष्णदास अधिकारी

Verse 14 of 28

मेरे जान तजहु, गिरिधरन जो तुमहि छाड़िं प्रिय कौन पै जाऊँ। कृष्णदास कहै या त्रिभुवन में तेरे द्वारे बिना हरि नाहीं कहूँ ठाऊँ॥ - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी हे मेरे प्रिय गिरिधरन, तुम्हारा प्रिय कौन है, मेरा प्रिय कौन है? कृष्णदास कहूँ या त्रिभुवन में तुम बिन हरि न कहूँ.. - श्री कृष्णदास श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी
मन लाग्यो गिरधर गावैमेरे तो गिरिधर ही गुणगान