ब्रज में रतन राधिका गोरी
Krishnadas Vani — श्री कृष्णदास अधिकारी
Verse 21 of 28
(राग सारंग)
रसिकिनी राधा रस भीनी।
मोहन रसिक लाल गिरधर पिय, अपने कंठमनि कीन्हीं॥ [1]
रसमय अंग-अंग रसरसमय, रसिक रसिकता चीन्ही।
उभय स्वरूप कीरति न्योंछावर, 'कृष्णदास' कर दीन्ही॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (695)
(राग सारंगा) रसिकिनी राधा रस भीनी। मोहन रसिक लाल गिरधर पिया, आपन कंठमणि किनिही। उभय स्वरूप कीर्ति न्योंचावर, 'कृष्णदास' ने किया.. [2] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (695)