वृषभानु कुँवरि खेलति बसंत
Krishnadas Vani — श्री कृष्णदास अधिकारी
Verse 28 of 28
(राग बसंत)
वृषभानु कुँवरि खेलति बसंत, फूली सखी जहाँ नवल कंत।
ताल मृदँग बाजै अरु निसान, खेलन निकसीं सुखनिधान॥ [1]
चोबा कुंकुम मची है कीच, मृगमद सखि जवादि बीच।
सघन कुंज में सुख-तरंग, ‘कृष्णदास’ आली राधे रवन-संग॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (961)
(राग बसंत) वृषभानु कुँवारी खेलती बसंत, परम मित्र जहाँ नाव रुकती है। ताल मृदंग बाजै अरु निसाँ, खेलन खाकनिम सुखनिधान।।[1] चोबा कुमकुम मची है किच, मृगमद सखी जावदि बिच। घने कुंज में सूखी लहर, रावण संग 'कृष्णदास' अली राधे.. [2] - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (961)